1. भारत का भौगोलिक क्षेत्र
- भारत की मुख्य भूमि उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से पश्चिम में गुजरात तक फैली हुई है। भारत का सीमान्तर्गत क्षेत्र आगे की ओर 12 समुद्री मील (लगभग 21. 9 किमी) फैला हुआ है।
- हमारे देश की दक्षिण सीमा बंगाल की खाड़ी में 6० 45' उत्तर अक्षांश के साथ निर्धारित होती है।
- भारत के अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार की गणना करें तो यह 30 है।
- उत्तर से दक्षिण भारत तक इसकी वास्तविक दूरी 3214 किमी है और और पूर्व से पश्चिम तक इसकी दूरी 2933 किमी है।
- भारत का क्षेत्रफ़ल लगभग 32. 8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो विश्व के स्थलीय धरातल का 2. 4 प्रतिशत भाग है। भारत विश्व का सातवाँ बड़ा देश है। भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत, उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश एवं सुलेमान श्रेणियाँ, उत्तर-पूर्व में पूर्वांचल पहाड़ियाँ तथा दक्षिण में विशाल हिन्द महासागर सीमांकित एक वृहत भौगोलिक इकाई है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता है। इसमें पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारत आता है।
- भारत की सम्पूर्ण तट रेखा द्वीप समूहों समेत 7517 किलोमीटर तक विस्तृत है।
2. भारत की संरचना एवं भूआकृति
- भूवैज्ञानिक संरचना एवं शैल समूह भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भूवैज्ञानिक खंडों में विभाजित किया जाता है, जो भौतिक लक्षणों पर आधारित है-
- (क) प्रायद्वीपीय खंड,
- (ख)हिमालय और अन्य अतिरिक्त पर्वतीय मालाएँ,
- (ग)सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान।
- (क) प्रायद्वीपीय खंड- प्रायद्वीपीय खंड की उत्तरी सीमा कच्छ से आरम्भ होकर अरावली पहाड़ियों के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक और फिर यमुना व गंगा नदी के सामानांतर राजमहल की पहाड़ियों एवं गंगा डेल्टा तक जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पूर्व में कर्बी ऐंग्लोंग व मेघालय का पठार तथा पश्चिम में राजस्थान भी इसी खंड के विस्तार हैं। पश्चिम बंगाल में मालदा भ्रंश उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित मेघालय व कर्बी ऐंग्लोंग पठार को छोटानागपुर पहाड़ से अलग करता है। राजस्थान में यह प्रायद्वीपीय खंड मरुस्थल व मरुस्थल सदृश्य स्थलाकृतियों से ढँका हुआ है। प्रायद्वीप मुख्यतः प्राचीन नाइस व ग्रेनाइट से बना है। नर्मदा, तापी और महानदी की रिफ्ट घाटियाँ और सतपुड़ा ब्लॉक इसके उदाहरण हैं। प्रायद्वीप में मुख्यतः अवशिष्ट पहाड़ियाँ शामिल हैं। जैसे- अरावली, नल्लामाला, जावादी, वेलीकोण्डा, पोल्कोंडा श्रेणी और महेन्द्रगिरी पहाड़ियाँ आदि।
- (ख)हिमालय और अन्य अतिरिक्त पर्वतीय मालाएँ- हिमालय और अन्य पर्वतीय मालाएँ की भूवैज्ञानिक सरचनाएँ तरुण, और लचीली हैं। ये पर्वत वर्तमान समय में भी बहिर्जनिक एवं अंतर्जनिक बलों की अन्तःक्रियाओं से प्रभावित है। गार्ज, V- आकार घाटियाँ, क्षिप्तिकाएँ व जल-प्रपात इत्यादि इसका प्रमाण हैं।
- (ग)सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान- भारत का तृतीय भूवैज्ञानिक खंड सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान है। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है।
भूआकृति
1.उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला -
1.उत्तर तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला -
इसमें हिमालय तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतमाला शामिल है. हिमालय में कई सामानांतर पर्वत शृंखलाएँ शामिल है। इसमें बृहत् हिमालय, पार हिमालय श्रृंखलाएँ, मध्य हिमालय और शिवालिक प्रमुख श्रेणियाँ हैं। भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग में हिमालय की ये श्रेणियाँ उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण- पूर्व की ओर फ़ैली हैं। बृहत् हिमालय श्रंखला,जिसे केंद्रीय अक्षीय श्रेणी भी कहा जाता है, की पूर्व से पश्चिम की लम्बाई लगभग 2500 किमी है तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 160 से 400 किमी है। हिमालय के निम्नलिखित उपखण्ड हैं-
(i) कश्मीर या उत्तरी-पश्चिमी हिमालय- इसकी विशेषताएँ निम्नवत है-
- कश्मीर हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ- काराकोरम, लद्दाख़, पीरपंजाल और जास्कर इत्यादि।
- कश्मीर हिमालय की उत्तर-पूर्वी भाग, जो बृहत् हिमालय और काराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है, एक ठंढा मरुस्थल है। इसी के बीच कश्मीर घाटी और डल झील है। दक्षिण एशिया की प्रमुख हिमानी नदियाँ बलटोरो और सियाचिन इसी प्रदेश में है। कश्मीर हिमालय करेवा के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ जाफ़रान होती है।
- बृहत् हिमालय में ज़ोजिला, पीरपंजाल में बनिहाल, जास्कर श्रेणी में फोटुला और लद्दाख़ श्रेणी में खुर्दगला जैसे महत्वपूर्ण दर्रे स्थित है। महत्वपूर्ण अलवण जल झील डल और वुलर तथा लवण की झील जैसे- Pongong-tso और Tsomuriri भी भी इसी श्रेणी में पाई जाती है। सिंधु और इसकी सहायक नदियाँ झेलम और चिनाब इस क्षेत्र को अपवाहित करती है। वैष्णो देवी, अमरनाथ गुफ़ा और चरार-ए-शरीफ़ भी यहीं स्थित है।
- प्रदेश के दक्षिणी भाग में अनुदैर्घ्य (Longitudinal) घाटियाँ पाई जाती है, जिन्हें दून कहा जाता है। इनमें जम्मू-दून और पठानकोट-दून प्रमुख है।
(ii) हिमाचल और उत्तराखंड हिमालय- इसकी विशेषताएँ निम्नवत है-
- हिमालय का यह हिस्सा पश्चिम में रावी नदी और पूर्व में काली (घाघरा की सहायक नदी) के बीच स्थित है। यह भारत की दो प्रमुख नदी तंत्रों सिंधु और गंगा द्वारा अपवाहित है।
- इस प्रदेश के अंदर बहने वाली नदियाँ- रावी, ब्यास और सतलुज (सिंधु की सहायक नदियाँ) और यमुना तथा घाघरा (गंगा की सहायक नदियाँ) हैं।
- हिमालय की तीनों मुख्य पर्वत शृंखलाएँ बृहत् हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक श्रेणी इस हिमालय खंड में स्थित है। महत्वपूर्ण पर्वत नगर- धर्मशाला, मसूरी, कसौली, अल्मोड़ा, लैंसडाउन और रानीखेत इसी क्षेत्र में है।
- इस क्षेत्र की दो महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ शिवालिक और दून है। महत्वपूर्ण दून इस प्रकार हैं- चंडीगढ़-कालका दून, नालागढ़ दून, देहरादून, हरीके दून तथा कोटा दून शामिल हैं। इनमें देहरादून सबसे बड़ी घाटी है, जिसकी लम्बाई 35 से 40 किमी और चौड़ाई 22 से 25 किमी है। बृहत् हिमालय की घाटियों में भोटिया प्रजाति के लोग रहते हैं। प्रसिद्ध 'फूलों की घाटी' भी इसी क्षेत्र में है। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब इसी इलाके में स्थित है।
(iii) दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय- इसकी विशेषताएँ निम्नवत है-
- इसके पश्चिम में नेपाल हिमालय और पूर्व में भूटान हिमालय है। यहाँ तेज़ बहाव वाली तिस्ता नदी बहती है और कंचनजंगा जैसी ऊँची चोटियाँ पाई जाती है।
- इन पर्वतों के ऊँचे शिखरों पर लेपचा जनजाति और दक्षिणी भाग (दार्जिलिंग हिमालय में) में मिश्रित जनसंख्या, जिसमे नेपाली, बंगाली और मध्य भारत की जनजातियाँ हैं, पाई जाती है। स्थान चाय के बागान तथा आर्किड के लिए प्रसिद्ध है।
(iv) अरुणाचल हिमालय- इसकी विशेषताएँ निम्नवत है-
- यह पर्वत क्षेत्र भूटान से लेकर पूर्व में डिफू दर्रे तक फैला है। सामान्य दिशा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पूर्व है। इस क्षेत्र की मुख्य चोटियों में काँगतु और नामचा बरवा शामिल है।
- कामेंग, सुबनसरी, दिहांग, दिबांग और लोहित यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। ये बारहमासी नदियाँ हैं और जलप्रपात हैं।
- इस क्षेत्र की प्रमुख जनजातियाँ हैं- मोनपा, अबोर, मिशमी, निशी और नागा। इनमें से ज्यादातर जनजातियाँ झूम खेती करती है। झूम खेती को स्थात्नान्तरि/स्लैश/बर्न कृषि भी कहा जाता है।
(v) पूर्वी पहाड़ियाँ और पर्वत- इसकी विशेषताएँ निम्नवत है-
- हिमालय पर्वत के इस भाग में पहाड़ियों की दिशा उत्तर से दक्षिण है। ये पहाड़ियाँ विभिन्न स्थानीय नामों जाती है- उत्तर में ये पटकाई बूम, नागा पहाड़ियाँ, मणिपुर पहाड़ियाँ और दक्षिण में मिज़ो या लुसाई पहाड़ियाँ के नाम से जनि जाती है। मिज़ोरम जिसे 'मोलेलिस बेसिन' भी कहा है, मृदुल और असंगठित चट्टानों से बना है।
- बराक, मणिपुर और मिज़ोरम की एक प्रमुख नदी है। 'लोकताक' झील मणिपुर घाटी के मध्य में स्थित है।
2. उत्तरी भारत का मैदान
- यह सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहकर नदियों द्वारा बहाकर लाये गए जलोढ़ निक्षेप से बना है। इस मैदान की पूर्व से पश्चिम तक लम्बाई लगभग 3200 किमी ही। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 300 किमी है। जलोढ़ निक्षेप की अधिकतम गहराई 1000 से 2000 किमी है।
- उत्तर से दक्षिण दिशा में इन मैदानों को तीन भागों में बाँटा गया है- भाभर, तराई और जलोढ़ मैदान। जलोढ़ मैदान को दो भागो में बाँटा जाता है- खादर और बाँगर।
- भाभर 8 से 10 किमी चौड़ाई की पतली पट्टी है, जो शिवालिक गिरिपाद के सामानांतर फैली हुई है।
- भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है, जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किमी है। यह क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति से ढँका रहता है और विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणियों का घर है।
- तराई से दक्षिण में मैदान है, जो पुराने और नए जलोढ़ से बना होने के कारण बाँगर और खादर कहलाता है। इसी मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बननेवाली अपरदानी और निक्षेप स्थलाकृतियाँ जैसे- बालू-रोधिका, विसर्प, गोखुर झीलें गुंफित नदियाँ पाई जाती है।
- उत्तर भारत के मैदान में बहनेवाली विशाल नदियाँ अपने मुहाने पर विश्व के बड़े-बड़े डेल्टाओं का निर्माण करती है। जैसे- सुंदरवन डेल्टा।
3. प्रायद्वीपीय पठार
- नदियों के मैदान से 150 मीटर ऊँचाई से उपर उठता हुआ प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा-फटा भूखंड है, जिसकी ऊँचाई 600 से 900 मीटर है।
- उत्तर-पश्चिम में दिल्ली, कटक (अरावली विस्तार), पूर्व में राजमहल की पहाड़ियाँ, पश्चिम में गिर पहाड़ियाँ और दक्षिण में इलायची पहाड़ियाँ प्रायद्वीपीय पठार की सीमाएँ निर्धारित करती हैं। उत्तर-पूर्व में कार्बी-ऐंगलोंग भी इसी भूखंड का विस्तार है।
- प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों से मिलकर बना है। जैसे- हजारीबाग पठार, पालायु का पठार, रांची का पठार, मालवा पठार, कोयम्बटूर पठार और कर्नाटक पठार।
- इस क्षेत्र की मुख्य प्राकृतिक स्थलाकृतियों में टॉर ब्लॉक पर्वत, भ्रंश घाटियाँ, पर्वत स्कंध, नग्न चट्टान संरचना, टेकरी पहाड़ी शृंखलाएँ और क्वार्ट्ज़ भित्तियाँ शामिल हैं, जो प्राकृतिक जल संग्रह के स्थल हैं। इस पत्थर के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भाग में मुख्या रूप से काली मिट्टी पाई जाती है।
- इस पठार की उत्तरी-पश्चिमी भाग में नदी खड्ड और महाखड्ड इसके धरातल को जटिल बनाते हैं। चम्बल, भिंड और और मोरेना खड्ड इसके उदाहरण हैं।
- प्रायद्वीपीय पठार को तीन भागों में बाँटा गया है-
(क) दक्कन का पठार- इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट, पूर्व में पूर्वी घाट और उत्तर में सतपुड़ा, मैकाल और महादेव पहाड़ियाँ हैं। पश्चिमी घाट को स्थानीय तौर पर अनेक नाम दिए गए हैं, जैसे- महाराष्ट्र में सह्याद्रि, कर्नाटक और तमिलनाडु में नीलगिरि और केरल में अनामलाई और इलायची पहाड़ियाँ हैं। प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची छोटी अनाईमुडी (2695 मीटर) है, जो पश्चिमी घाट की अनामलाई पहाड़ियों में स्थित है। दूसरी सबसे ऊँची छोटी डोडाबेटा है, जो नीलगिरि की पहाड़ियों में है। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। यहाँ की मुख्य श्रेणियाँ जावडी पहाड़ियाँ, पालकोण्डा श्रेणी, नल्लामाला पहाड़ियाँ और महेन्द्रगिरि पहाड़ियाँ हैं। पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरि पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं।
(ख) मध्य उच्च भूभाग- पश्चिम में अरावली पर्वत इसकी सीमा बनाते हैं। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 600 से 900 मीटर है। यहाँ कायांतरित चट्टानें जैसे- संगमरमर, स्लेट और नाइस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यमुना की अधिकतर सहायक नदियाँ विंध्याचल और कैमूर श्रेणियों से निकलती है। बनास चम्बल की एकमात्र सहायक नदी है जो पश्चिम में अरावली से निकलती है। मध्य उच्च भूभाग का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों तक है, जिसके दक्षिण में स्थित छोटानागपुर पठार खनिज़ पदार्थों का भंडार है।
(ग) उत्तर-पूर्वी पठार- निवास करने वाली जनजातियों के आधार पर मेघालय के पठार को तीन भागों में बाँटा गया है- गारो पहाड़ियाँ, खासी पहाड़ियाँ एवं जयंतिया पहाड़ियाँ। असम की कारबी-ऐंगलोंग पहाड़ियाँ भी इसी का विस्तार है। मेघालय के पठार में कोयला, लोहा, सिलीमेनाइट, चूने के पत्थर यूरेनियम जैसे खनिज पदार्थों का भंडार है। इस क्षेत्र में अधिकतर वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से होती है।
(ख) मध्य उच्च भूभाग- पश्चिम में अरावली पर्वत इसकी सीमा बनाते हैं। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 600 से 900 मीटर है। यहाँ कायांतरित चट्टानें जैसे- संगमरमर, स्लेट और नाइस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यमुना की अधिकतर सहायक नदियाँ विंध्याचल और कैमूर श्रेणियों से निकलती है। बनास चम्बल की एकमात्र सहायक नदी है जो पश्चिम में अरावली से निकलती है। मध्य उच्च भूभाग का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों तक है, जिसके दक्षिण में स्थित छोटानागपुर पठार खनिज़ पदार्थों का भंडार है।
(ग) उत्तर-पूर्वी पठार- निवास करने वाली जनजातियों के आधार पर मेघालय के पठार को तीन भागों में बाँटा गया है- गारो पहाड़ियाँ, खासी पहाड़ियाँ एवं जयंतिया पहाड़ियाँ। असम की कारबी-ऐंगलोंग पहाड़ियाँ भी इसी का विस्तार है। मेघालय के पठार में कोयला, लोहा, सिलीमेनाइट, चूने के पत्थर यूरेनियम जैसे खनिज पदार्थों का भंडार है। इस क्षेत्र में अधिकतर वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से होती है।
4. भारतीय मरुस्थल
- विशाल भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों से उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह एक उबड़-खाबड़ भूतल है, जिस पर बहुत से अनुदैर्ध्य रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं। यहाँ वार्षिक वर्षा 150 मिमी से कम होती है और परिणामस्वरूप यह एक शुष्क और वनस्पति रहित क्षेत्र है।
- यहाँ की प्रमुख स्थलाकृतियाँ स्थानांतरी रेतीले टीले, छत्रक चट्टानें और मरुद्यान (दक्षिणी भाग में) है।
- ढ़ाल के आधार पर मरुस्थल को दो भागों में बाँटा जा सकता है- सिंध की ओर ढ़ाल वाला उत्तरी भाग और कच्छ के रन की ओर ढ़ाल वाला दक्षिणी भाग। मरुस्थल के दक्षिणी भाग में बहनेवाली लूनी नदी काफी महत्वपूर्ण है।
5. तटीय मैदान
- तटीय मैदान को दो भागों में बाँटा जा सकता है- पूर्वी तटीय मैदान और पश्चिमी तटीय मैदान।
- जलमग्न होने के कारन पश्चिमी तटीय मैदान एक संकीर्ण पट्टी मात्र है और पत्तनों एवं बंदरगाहों के विकास के लिये प्राकृतिक परिस्थितियाँ प्रदान करता है। यहाँ पर स्थित प्राकृतिक बंदरगाहों में कांडला, मझगाँव, जे. एल. नावहा शेवा, मर्मागाओ, मैंगलोर, कोचीन शामिल है।
- उत्तर में गुजरात तट से दक्षिण में केरल तट तक फैले पश्चिमी तटीय मैदान को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है- गुजरात का कच्छ और कठियावाड़ा तट, महाराष्ट्र का कोंकण तट और गोवा तट, कर्नाटक तथा केरल के मालाबार तट। मालाबार तट की विशेष स्थलाकृति 'कयाल' है, जिसे मछली पकड़ने और अंतः स्थलीय नौकायन प्रतियोगिता के लिए प्रयोग किया जाता है।
- पश्चिमी तट की तुलना में पूर्वी तटीय मैदान चौड़ा और उभरे हुए तट का उदहारण है। नदियाँ यहाँ लम्बा-चौड़ा डेल्टा बनती है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी डेल्टा शामिल है। यहाँ पत्तन या पोताश्रय कम है।
6. द्वीप समूह
- भारत के दो द्वीप समूह हैं- एक बंगाल की खाड़ी में और दूसरा अरब सागर में।
- बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं। ये द्वीप 6० उत्तर से 14० उत्तर और 92० पूर्व से 94० पूर्व के बीच स्थित है। रिची द्वीप समूह और लबरीन्थ द्वीप यहाँ के दो प्रमुख द्वीप समूह है। बंगाल की खाड़ी के द्वीपों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार। बैरन आइलैंड नामक भारत एकमात्र जीवंत ज्वालामुखी भी निकोबार द्वीप समूह में स्थित है।
- अरब सागर के द्वीपों में लक्षद्वीप और मिनिकॉय शामिल है। ये द्वीप 80० उत्तर से 12० उत्तर और 71० पूर्व से 74० पूर्व के बीच बिखरे हुए हैं। पूरा द्वीप समूह प्रवाल निक्षेप का बना है। यहाँ 36 द्वीप हैं, जिनमें से 11 पर मानव आवास है। मिनिकॉय सबसे बड़ा द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल 453 वर्ग किमी है।
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धन्यवाद।
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